नाबालिग के साथ live-in relation को नहीं मिलेगा कानूनी संरक्षण: इलाहाबाद High Court

प्रयागराज। स्थित Allahabad High Court ने Live-in rights को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि किसी संबंध में एक साथी की उम्र वैधानिक विवाह आयु से कम है, तो अदालत ऐसे रिश्ते को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत संरक्षण नहीं दे सकती।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भारतीय कानून के अनुसार विवाह के लिए निर्धारित न्यूनतम आयु से कम उम्र वाले व्यक्ति के साथ लिव-इन संबंध को कानूनी मान्यता या संरक्षण देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में संवैधानिक अधिकारों की व्याख्या कानून के दायरे में रहकर ही की जाएगी।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त रहेगा। कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता और जरूरत पड़ने पर उन्हें कानून के तहत संरक्षण मिलता रहेगा।
यह टिप्पणी एक याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें लिव-इन रिलेशन में रह रहे एक जोड़े ने सुरक्षा की मांग की थी। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी की जाए। Article 226 of the Constitution of India के तहत हाई कोर्ट को विशेष अधिकार प्राप्त हैं, जिनके माध्यम से वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आदेश जारी कर सकता है। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि इन अधिकारों का इस्तेमाल कानून के अनुरूप ही किया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार अदालत ने एक ओर जहां वैधानिक विवाह आयु को महत्व दिया है, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत सुरक्षा और स्वतंत्रता के अधिकार को भी संतुलित तरीके से बनाए रखा है। इस फैसले के बाद सामाजिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे कानून और सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में बहस का विषय मान रहे हैं।
इलाहबाद उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी को लेकर अब विभिन्न कानूनी विशेषज्ञ और सामाजिक संगठन अपने-अपने स्तर पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। फिलहाल यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप और वैधानिक आयु से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है।



