
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आज केरल के वायनाड में एक बौद्धिक सभा को संबोधित करते हुए वैश्विक व्यवस्था और भारत की कूटनीतिक स्थिति पर एक अत्यंत गंभीर और चेतावनी भरा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि “दुनिया की राजनीति और कूटनीति अब एक ऐसे अंधेरे की ओर बढ़ रही है,” जहाँ संवाद की जगह ध्रुवीकरण और शांति की जगह युद्ध के नगाड़ों ने ले ली है। राहुल गांधी के अनुसार, वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में मानवीय मूल्यों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को किनारे कर केवल सत्ता और संसाधनों की अंधी दौड़ चल रही है, जिससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रासंगिकता खत्म होती जा रही है। उन्होंने भारत की विदेश नीति पर कटाक्ष करते हुए कहा कि मोदी सरकार केवल बड़े देशों के दबाव में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता खोती जा रही है, जो भविष्य के लिए एक खतरनाक संकेत है। राहुल गांधी ने जोर देकर कहा कि यदि दुनिया ने अपने कूटनीतिक रास्तों को नहीं बदला, तो आने वाली पीढ़ी को एक अस्थिर और असुरक्षित विश्व विरासत में मिलेगा।
राहुल गांधी ने अपनी चेतावनी को विस्तार देते हुए रूस-यूक्रेन और हालिया पश्चिम एशिया के संकटों का जिक्र किया, जहाँ कूटनीति पूरी तरह विफल साबित हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत जैसे देश, जिनकी ऐतिहासिक भूमिका शांतिदूत की रही है, अब केवल “इवेंट मैनेजमेंट” और फोटो खिंचवाने तक सीमित रह गए हैं, जबकि सीमाओं पर तनाव और वैश्विक अस्थिरता बढ़ रही है। राहुल के अनुसार, “अंधेरे” का अर्थ केवल युद्ध नहीं, बल्कि वह वैचारिक शून्यता है जहाँ सत्य को प्रोपेगेंडा के जरिए दबाया जा रहा है और आम जनता की आवाज को बंदूकों और सेंसरशिप से कुचला जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि डेटा सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तकनीकों का उपयोग अब विकास के बजाय निगरानी और नियंत्रण के लिए किया जा रहा है, जो कूटनीति के पतन का एक बड़ा कारण है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भारत वास्तव में विश्वगुरु बनने की दिशा में है या हम केवल वैश्विक शक्तियों के शतरंज के मोहरे बनकर रह गए हैं?
संबोधन के अंतिम चरण में राहुल गांधी ने इस “अंधेरे” से बाहर निकलने का रास्ता बताते हुए ‘करुणा और संवाद’ की कूटनीति पर वापस लौटने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी पुरानी पहचान बहाल करनी होगी, जहाँ हम दुनिया को डराने के बजाय उसे साथ लेकर चलने का साहस दिखाते थे। राहुल ने युवाओं और भावी राजनयिकों से अपील की कि वे केवल लाभ-हानि के समीकरणों पर आधारित राजनीति को त्यागकर ‘न्याय और समानता’ के वैश्विक ढांचे के लिए काम करें। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हमने अपनी विदेश नीति में सुधार नहीं किया और पड़ोसियों के साथ बिगड़ते रिश्तों को नहीं संभाला, तो भारत अपनी रणनीतिक बढ़त खो देगा। 7 मार्च की इस दोपहर ने राहुल गांधी के माध्यम से वैश्विक राजनीति के एक स्याह पक्ष को उजागर किया है, जो आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका को लेकर एक नई बहस छेड़ेगा। राहुल ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी एक ऐसी विदेश नीति की पक्षधर है जो केवल “मजबूरी का नतीजा” न हो, बल्कि भारत के आत्मसम्मान और वैश्विक शांति का प्रतिबिंब हो।



