
ईरान के मिनाब क्षेत्र और अन्य रणनीतिक ठिकानों पर हुए भीषण अमेरिकी हमलों ने पूरी दुनिया में युद्ध की आहट तेज कर दी है, जिसका असर अब भारत की राजनीति में भी साफ दिखने लगा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस संवेदनशील वैश्विक घटनाक्रम पर केंद्र की मोदी सरकार की “रहस्यमयी खामोशी” को लेकर कड़े सवाल खड़े किए हैं। राहुल गांधी ने वायनाड से जारी अपने बयान में कहा कि जब दुनिया एक नए और विनाशकारी युद्ध की कगार पर खड़ी है, तब खुद को ‘विश्वगुरु’ कहने वाली सरकार का कोई स्पष्ट रुख न होना चिंताजनक है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत की विदेश नीति अब स्वतंत्र रहने के बजाय पूरी तरह से वाशिंगटन के दबाव में काम कर रही है, जिससे हमारी कूटनीतिक साख गिर रही है। अखिलेश यादव ने भी लखनऊ में मीडिया से बात करते हुए सरकार को घेरा और पूछा कि क्या ईरान में फंसे हजारों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों पर सरकार के पास कोई ठोस योजना है? दोनों नेताओं ने मांग की है कि प्रधानमंत्री को तुरंत देश के सामने आकर इस अंतरराष्ट्रीय संकट पर भारत का आधिकारिक पक्ष स्पष्ट करना चाहिए।
विपक्ष के इन तीखे हमलों का केंद्र केवल युद्ध का विरोध नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को बचाने की चिंता भी है, जो दशकों से हमारी विदेश नीति का स्तंभ रही है। राहुल गांधी के अनुसार, ईरान के साथ भारत के गहरे सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध रहे हैं, विशेषकर चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए, जिन पर इन हमलों का सीधा और नकारात्मक असर पड़ सकता है। अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा कि सरकार केवल ‘इवेंट मैनेजमेंट’ में व्यस्त है, जबकि वैश्विक पटल पर भारत की भूमिका एक मूकदर्शक की बनकर रह गई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा भारत की अर्थव्यवस्था और मध्यम वर्ग को महंगाई के रूप में भुगतना होगा। समाजवादी पार्टी प्रमुख ने सवाल उठाया कि “लाल आंखें” दिखाने का दावा करने वाली सरकार अंतरराष्ट्रीय मानवीय सिद्धांतों के उल्लंघन पर चुप क्यों है? विपक्षी गठबंधन का तर्क है कि भारत को शांति स्थापना के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए थी, न कि केवल खामोशी अख्तियार कर समय गुजारना चाहिए।
इस राजनीतिक घमासान के बीच, राहुल और अखिलेश के साझा सवालों ने केंद्र सरकार पर कूटनीतिक दबाव बढ़ा दिया है, जिससे विदेश मंत्रालय में बैठकों का दौर तेज हो गया है। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि कूटनीति का अर्थ केवल बड़े देशों के साथ हाथ मिलाना नहीं, बल्कि वैश्विक संकट के समय न्यायपूर्ण और स्वतंत्र आवाज उठाना भी है। अखिलेश यादव ने आह्वान किया है कि सरकार को विपक्षी दलों के साथ एक सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के साझा हितों पर चर्चा हो सके। 7 मार्च 2026 की यह दोपहर भारतीय राजनीति में ‘राष्ट्रवाद बनाम वैश्विक उत्तरदायित्व’ की एक नई बहस के रूप में उभरकर सामने आई है, जहाँ विपक्ष सरकार की विदेश नीति को “मजबूरी का नतीजा” बता रहा है। अब सबकी निगाहें विदेश मंत्रालय के अगले बयान पर टिकी हैं कि क्या भारत इस युद्ध की आग को शांत करने के लिए कोई प्रभावी कदम उठाएगा? यह विवाद न केवल संसद में गूंजने वाला है, बल्कि आने वाले चुनाव में भी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के मुद्दे को एक नया मोड़ दे सकता है।



