
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आज लखनऊ की सड़कों पर ‘जातीय जनगणना’ की मांग को लेकर एक विशाल साइकिल यात्रा का नेतृत्व किया, जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। इस मार्च की शुरुआत करते हुए अखिलेश ने एक बेहद शक्तिशाली रील हुक दिया— “हक मांग रहे हैं, भीख नहीं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि जातीय जनगणना केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उन पिछड़ों, दलितों और वंचितों को उनका वाजिब सामाजिक और आर्थिक हिस्सा दिलाने का एक संवैधानिक अधिकार है। साइकिल पर सवार अखिलेश के साथ हजारों कार्यकर्ताओं का हुजूम ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारों के साथ आगे बढ़ा, जिसने राजधानी के मुख्य चौराहों को सपा के झंडों से पाट दिया। इस मार्च के जरिए अखिलेश ने सीधा संदेश दिया है कि बिना सटीक आबादी के आंकड़ों के, विकास की कोई भी योजना समावेशी नहीं हो सकती और भाजपा इसे रोककर केवल सामाजिक अन्याय कर रही है।
अखिलेश यादव ने इस पदयात्रा और साइकिल मार्च के दौरान उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए इसे “डेटा का डर” करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जब सरकार जानवरों, पेड़ों और मोबाइल फोन तक की गिनती कर सकती है, तो इंसानों की जाति गिनने में उसे क्या परहेज है? सपा प्रमुख के अनुसार, जातीय जनगणना के बिना आरक्षण का सही लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच रहा है और मुट्ठी भर लोग ही संसाधनों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा जानबूझकर इस मुद्दे को टाल रही है क्योंकि वह पिछड़ों और दलितों की असली ताकत को उजागर होने से डरती है, ताकि उनका राजनीतिक शोषण जारी रह सके। अखिलेश ने मंच से घोषणा की कि यह केवल एक दिन की यात्रा नहीं है, बल्कि अब यह गांव-गांव तक फैलेगी और जब तक जनगणना का आदेश नहीं आता, समाजवादियों का यह संघर्ष थमने वाला नहीं है।
इस ‘जातीय मार्च’ ने 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए समाजवादी पार्टी के मुख्य एजेंडे को पूरी तरह साफ कर दिया है, जहाँ ‘सामाजिक न्याय’ सबसे बड़ा हथियार होगा। अखिलेश ने युवाओं और छात्रों से मुखातिब होते हुए कहा कि अगर उन्हें सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अपना सही स्थान चाहिए, तो उन्हें इस ‘हक की लड़ाई’ में सबसे आगे आना होगा। उन्होंने भाजपा के “सबका साथ, सबका विकास” के नारे को खोखला बताते हुए कहा कि बिना गिनती के विकास केवल एक छलावा है जो कुछ खास वर्गों तक ही सीमित है। मार्च के समापन पर उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ही जातीय जनगणना पर कोई ठोस फैसला नहीं लिया, तो पूरा उत्तर प्रदेश सड़कों पर उतरेगा और इसका खामियाजा सत्ता पक्ष को आगामी चुनावों में भुगतना पड़ेगा। लखनऊ की सड़कों पर उमड़ा यह जनसैलाब इस बात का गवाह बना कि अब उत्तर प्रदेश की राजनीति ‘मंडलीकरण’ के एक नए और अधिक मुखर दौर में प्रवेश कर चुकी है।



